भारत में कपास की कीमतों में तेजी, निर्यात मांग और मौसम की मार से आपूर्ति पर दबाव

भारत में कपास की कीमतों में तेजी, निर्यात मांग और मौसम की मार से आपूर्ति पर दबाव
भारत का कपास बाजार इन दिनों आपूर्ति की कमी और बढ़ती मांग के दबाव का सामना कर रहा है। कपड़ा निर्यात की संभावनाएं बढ़ने, मौसम संबंधी जोखिम और कच्चे कपास पर आयात शुल्क में छूट को लेकर अनिश्चितता के कारण घरेलू बाजार में कपास की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है।
उद्योग संगठनों का अनुमान है कि वर्ष 2026-27 के कपास सीजन में घरेलू मांग और उत्पादन के बीच का अंतर और बढ़ सकता है।
घरेलू बाजार में कपास की कीमतों में तेजी
स्पॉट मार्केट के आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में 29 मिमी बेंचमार्क कपास की कीमत में प्रति कैंडी ₹4,500 की बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही कीमत बढ़कर ₹68,500 प्रति कैंडी तक पहुंच गई है।
बाजार में खरीदारी बढ़ने और आने वाले सीजन में कपास की उपलब्धता कम रहने की आशंका को इस तेजी का प्रमुख कारण माना जा रहा है।
व्यापार समझौतों से बढ़ सकती है कपास की मांग
भारत और ब्रिटेन के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय कपड़ा और परिधान निर्यात को नए अवसर मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ संभावित व्यापार समझौता भी वर्ष 2027 में निर्यात की मांग को बढ़ा सकता है।
साउदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन के महासचिव के. सेल्वराज के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में ब्रिटेन से निर्यात मांग में सुधार हुआ है।
उनका अनुमान है कि नए व्यापार अवसरों के कारण कपास की खपत आगामी सीजन में 36 मिलियन गांठ से अधिक हो सकती है। इससे घरेलू कपास की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।
कपास उत्पादन 28 मिलियन गांठ से नीचे रहने की आशंका
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026-27 में भारत का कपास उत्पादन 28 मिलियन गांठ से नीचे रह सकता है।
अल नीनो और सूखे जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियों के कारण कई क्षेत्रों में कपास की फसल प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
यदि कपास की मांग 36 मिलियन गांठ से अधिक और उत्पादन 28 मिलियन गांठ से कम रहता है, तो मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर 9 मिलियन गांठ से अधिक हो सकता है।
पिछले वर्ष यह अंतर लगभग 7 मिलियन गांठ रहने का अनुमान था। ऐसी स्थिति में भारत को कपास आयात पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
कपास आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा
भारत में वर्ष 2025-26 के दौरान कपास आयात लगभग 7.1 मिलियन गांठ रहने का अनुमान है। प्रत्येक गांठ का वजन 170 किलोग्राम है।
पिछले वर्ष भारत ने लगभग 5.74 मिलियन गांठ कपास का आयात किया था। इस तरह आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
कपड़ा मिलों को केवल कपास की मात्रा ही नहीं, बल्कि अच्छी गुणवत्ता वाले कच्चे कपास की उपलब्धता को लेकर भी चिंता है।
आयात शुल्क में छूट को लेकर अनिश्चितता
कच्चे कपास पर लागू 11 प्रतिशत आयात शुल्क से अस्थायी छूट 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक निर्धारित थी।
अब बाजार में इस बात पर नजर है कि सरकार इस छूट को आगे बढ़ाती है या नहीं।
यदि आयात शुल्क में छूट जारी रहती है, तो विदेशों से कपास खरीदने की लागत प्रभावित हो सकती है। वहीं, छूट समाप्त होने पर आयातित कपास महंगा पड़ सकता है।
इस अनिश्चितता के कारण कपड़ा मिलें और व्यापारी अपनी खरीदारी को लेकर सावधानी बरत रहे हैं।
किसान कपास रोककर रख रहे, मिलों पर बढ़ा दबाव
कुछ क्षेत्रों में किसान बेहतर भाव मिलने की उम्मीद में अपनी कपास की फसल रोककर रख रहे हैं।
कम मिट्टी की नमी और कुछ क्षेत्रों में फसल पद्धति में बदलाव के कारण भी कपास की आवक प्रभावित होने की खबरें हैं।
दूसरी ओर, जिनिंग इकाइयों और कपड़ा मिलों की लागत बढ़ रही है। कपास की कीमतों में तेजी के मुकाबले सूत की कीमतों में उतनी वृद्धि नहीं होने से प्रोसेसिंग कारोबार के मुनाफे पर दबाव पड़ रहा है।
2026-27 में कपास बाजार का क्या रहेगा रुख?
आगामी कपास सीजन में बाजार की दिशा कई महत्वपूर्ण बातों पर निर्भर करेगी:
कपास उत्पादन और मौसम की स्थिति।
ब्रिटेन और यूरोपीय संघ से मिलने वाले निर्यात ऑर्डर।
कच्चे कपास पर आयात शुल्क में छूट का फैसला।
विदेशों से कपास का आयात और उपलब्धता।
किसानों की बिक्री और मंडियों में कपास की आवक।
यदि निर्यात मांग बढ़ती है और घरेलू उत्पादन कम रहता है, तो कपास की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, वास्तविक बाजार भाव उत्पादन, आयात, सरकारी नीतियों और मिलों की मांग पर निर्भर करेंगे।
